लघुसिद्धान्तकौमुदी · वरदराज
3.4.111
लङः शाकटायनस्यैव
लघुसिद्धान्तकौमुदी 566 · प्रकरण 13, which opens at अदिप्रभृतिभ्यः शपः · rule 17 of 53 in it
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वरदराज writes under it
आदन्तात्परस्य लङो झेर्जुस् वा स्यात्। अयुः, अयान्। यायात्। यायाताम्। यायुः। यायात्। यायास्ताम्। यायासुः। अयासीत्। अयास्यत्। ॥ {$ {! 5 वा !} गतिगन्धनयोः $} (धातुपाठे <{02.0045}>) ॥ {$ {! 6 भा !} दीप्तौ $} (धातुपाठे <{02.0046}>) ॥ {$ {! 7 ष्णा !} शौचे $} (धातुपाठे <{02.0047}>) ॥ {$ {! 8 श्रा !} पाके $} (धातुपाठे <{02.0048}>) ॥ {$ {! 9 द्रा !} कुत्सायां गतौ $} (धातुपाठे <{02.0049}>) ॥ {$ {! 10 प्सा !} भक्षणे $} (धातुपाठे <{02.0050}>)॥ {$ {! 11 रा !} दाने $} (धातुपाठे <{02.0052}>) ॥ {$ {! 12 ला !} आदाने $} (धातुपाठे <{02.0053}>) ॥ {$ {! 13 दाप् !} लवने $} (धातुपाठे <{02.0054}>) ॥ {$ {! 14 पा !} रक्षणे $} (धातुपाठे <{02.0051}>) ॥ {$ {! 15 ख्या !} प्रकथने $} (धातुपाठे <{02.0055}>) ॥ अयं सार्वधातुक एव प्रयोक्तव्यः॥ {$ {! 16 विद !} ज्ञाने $} (धातुपाठे <{02.0059}>) ॥
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This corpus carries no example of the rule. Meghadūta is one poem of 120 verses, and most of the abridgement reaches none of it.