मेघदूतम् · कालिदास · 1.65

मेघदूतम् · कालिदास · 1.65

अलका · the city on Kailāsa's lap

तस्योत्सङ्गे प्रणयिन इव स्रस्तगङ्गादुकूलां

त
स्यो
त्स
ङ्गे
प्र
ण
यि
न
इ
व
स्र
स्त
ग
ङ्गा
दु
कू
लां

न त्वं दृष्ट्वा न पुनरलकां ज्ञास्यसे कामचारिन्

न
त्वं
दृ
ष्ट्वा
न
पु
न
र
ल
कां
ज्ञा
स्य
से
का
म
चा
रिन्

या वः काले वहति सलिलोद्गारमुच्चैर्विमाना

या
वः
का
ले
व
ह
ति
स
लि
लो
द्गा
र
मु
च्चै
र्वि
मा
ना

मुक्ताजालग्रथितमलकं कामिनीवाभ्रवृन्दम्

मु
क्ता
जा
ल
ग्र
थि
त
म
ल
कं
का
मि
नी
वा
भ्र
वृ
न्दम्