मेघदूतम् · कालिदास · 2.31

मेघदूतम् · कालिदास · 2.31

विरहशयन · the sleep asked for, for the dream in it

निःश्वासेनाधरकिसलयक्लेशिना विक्षिपन्तीं

निः
श्वा
से
ना
ध
र
कि
स
ल
य
क्ले
शि
ना
वि
क्षि
प
न्तीं

शुद्धस्नानात् परुषमलकं नूनमागण्डलम्बम्

शु
द्ध
स्ना
ना
त्प
रु
ष
म
ल
कं
नू
न
मा
ग
ण्ड
ल
म्बम्

मत्संभोगः कथमुपनमेत् स्वप्नजोऽपीति निद्रां

म
त्सं
भो
गः
क
थ
मु
प
न
मे
त्स्व
प्न
जो
ऽपी
ति
नि
द्रां

आकाङ्क्षन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम्

आ
का
ङ्क्ष
न्तीं
न
य
न
स
लि
लो
त्पी
ड
रु
द्धा
व
का
शाम्